अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले - सारांश
<h3>1. लेखक व रचना परिचय</h3> <p><b>लेखक:</b> निदा फ़ाज़ली (संवेदनशील और सरल भाषा में गहरी सामाजिक बातें कहने वाले कवि)।</p> <p><b>रचना:</b> गद्य पाठ, जिसमें आधुनिक मनुष्य की स्वार्थपरता, संवेदनहीनता और प्रकृति के प्रति बेरुखी को दिखाया गया है।</p> <h3>2. सारांश (कहानी का मूल भाव)</h3> <ul> <li>पाठ में बताया गया है कि पहले के समय में लोग दूसरों के दुख–सुख में साझेदारी निभाते थे, पर अब मनुष्य केवल अपने लाभ के बारे में सोचता है।</li> <li>इंसान ने अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति और जानवरों का शोषण शुरू कर दिया है।</li> <li>लेखक दिखाते हैं कि मनुष्य की 'और अधिक पाने' की भूख के कारण जंगल कट रहे हैं और नदियाँ मैली हो रही हैं।</li> </ul> <h3>3. मुख्य बिंदु / Ideas</h3> <ul> <li><b>प्रकृति का शोषण:</b> पेड़ काटना, नदियों को गंदा करना इंसान के लालच की देन है।</li> <li><b>सहानुभूति (Empathy) की कमी:</b> समाज में आपसी सहयोग की कमी हो गई है और लोग स्वार्थी हो गए हैं।</li> </ul> <h3>4. संदेश (Message of the chapter)</h3> <p>हमें अपने भीतर दूसरों के दुख के प्रति संवेदना को फिर से जगाना चाहिए। इंसान और प्रकृति का रिश्ता परस्पर निर्भर है; प्रकृति का विनाश, अंत में मनुष्य का ही विनाश है।</p>